Tanu Weds Manu Returns - A Must & Must & Must Watch, Zaroor Dekhna






यार हद हो गई। बिरले ही ऐसा वक़्त आया जब नौशाद इरशाद से बेहतर निकले। नहीं समझे इरशाद मतबल शुरुआत और नौशाद माने अगला पार्ट। कानपुर से निकली कहानी लंदन तक पहुंची और यकीन नहीं मानेंगे कि ये तो और जानलेवा हो गई भाई साब। लंदन में पतिदेव को पागलखाने पहुंचाकर पत्नी जी का दिल था कि माने ना, इंडिया आ गईं लेकिन चाहती थीं कि मनु जी पागलखाने से बाहर निकल आवें।

क्या कहानी लिखी है। हमें उम्मीद ना थी कि तनु वेड्स मनु में शादी के बाद भी ऐसी कोई कहानी आ सके है। लेकिन कसम उड़ान झल्ले की कहानी बस आई नहीं, आई तो शुरू से ही सबकी झंड कर दी। झंड तो समझते हैं ना। चलिये कोई नहीं कहानी को आपको समझने की कोई ज़रुरत नहीं है। जैसे ही फिलम शुरू होगी आपकी अपनी हो जाएगी। जो डायलॉग लिख दिया है ना वो बस लिख दिया है। बहुत हुआ सम्मान तुम्हारी मां का.... समझ गये ना, बस ऐसे ही है। शादी के बाद का प्रैक्टिकल प्रॉब्लम तो अलग है, जो गलतफहमी में या कहें नासमझी में दो कदम आगे निकल जाते हैं।

एक नया कैरेक्टर ऐड हुआ है चिंटू जी। और चिंटू जी को जो बैटमैन का सारा जलवा दिखा, उसके हाथ से खूनी मंगलसूत्र का उपन्यास भी गिर गया। और चिंटू जब इस रामायण के रावण से मिले तो उन्हें समझ में ना आया कि जो तनु की कश्ती वहां डूबी जहां पानी कम था और हां वो कंधा कैसे भूल सकते हैं जो रावल के झटकने पर डाक्टर आये और दोनों के झटकने पर ये आ गये। अरे भाई हमारे चिंटू जी। समझिये मतलब कहानीकार ने क्या पिरोया है और कहानी का नाम हम इसलिए नहीं बता रहे कि थोड़ी ज़हमत आप भी उठाइए, अरे बड़ी मेहनत से फिल्म बनाई है भाई।

यहां तक तो थोड़ा कहानी को जोड़ा जा रहा था। असल कहानी तो अब शुरू हुई जी दिल्ली से। और वो दिख गई डाक्टर साहब को दौड़ते हुए और बस झटका भी डाक्टर के हिस्से में। वो हरियाणवी बोलने वाली तनु की इंजरी तो बाहर हुई, डाक्टर साहब तो बाहर से घायल हो गये।

यो जो हरियाणवी में तनु मिली गजब हो गया। अरे क्या गजब हरियाणवी बोली छोरी। ये जो अपनी के नाम से? कंगना से ना सही बोले तो, क्या कमाल किया है ये छोरी ने। दिल्ली का शूट तो मतलब इस फिलम की जान बन गया। और लो चली गई कुसुम रोती हुई, ना कोई रिस्ता ना हो सके है, या ते भाई या कम्पटिसन और शर्मा जी ने लगा एक और झटका। हरियाणवी सख़्त आंखें भी बह गईं और यही कहानी है। आगे ख़ुद देख लेना।


कहानी में दम है। एक्टिंग में तो इन दो की जगह आप किसी और को सोच भी ना सके हैं। चिंटू भाई साब भी नई एंट्री के तौर पर बिल्कुल फिट बैठते हैं। ठेठ और असरदार। जिमी ना हो तो मतलब ये बस ना सही ठिकाने ना पहुंचे। जो ना देखा तो भूल कर दी। हमने देखने में थोड़ी देरी की भूल करी, आप ना करियो। देख लो, मजो में रहेगो।

संगीत पर मत जाना आशिकी कहानी से कर लो, एक्टिंग से कर लो और सबसे ज़्यादा तनु से कर लो उससे भी ना हो तो कुसुम से तो हो ही जाना है। शर्मा जी तो अपनी सादगी की वही मिसाल छोड़ेंगे और तनु से आपको मोहल्ले की बैटमैन वाला मिज़ाज महसूस हो जाएगा। बस जी पैसा वसूल हो गया।
Sone Time You Realize That She Looks  Like Another Actor In Her Double Role
Jai Ho! - Total Salman Type Movie - Decent Watch



बॉडीगार्ड, रेडी, दबंग और दबंग-2 के बाद अगर ये फ़िल्म सलमान की तुलना में खड़ी की जाएगी तो सलमान तो आपको और अच्छे लगेंगे, लेकिन पूरी तरह से फ़िल्म के मामले में जय हो! निराश करती है। स्क्रीनप्ले इस तरह से बिखरा हुआ है कि पता ही नहीं चल पाता कि कहानी कहां से शुरू हुई और किस रास्ते से आगे बढ़ रही है। कई जगहों पर किरदारों से भी नाइंसाफ़ी की गई है, अधिकतर किरदारों को फ़िल्म में ख़ुद को दिखाने का और कहानी में अपनी ज़रुरत को साबित करने का मौक़ा ही नहीं मिला है। 

जय हो दक्षिण की 2006 की फ़िल्म स्तालिन की रिमेक है जो ख़ुद हॉलीवुड की पे इट फॉरवर्ड से प्रेरित थी। लेकिन जिस तरह से डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले के मामले में स्तालिन कसी हुई थी, यहां उसकी कमी देखने को मिलती है। अलबत्ता दिलीप शुक्ला ने कहानी लिखने में जो कंजूसी की उसे उन्होंने सलमान ख़ान के संवादों को लिखने और कुछ कॉमेडी सीन्स को लिखने में पूरा कर दिया है।

फ़िल्म की कहानी उस आर्मी अफ़सर की है जो अपने सीनियरों से दुर्व्यवहार करने पर निकाल दिया जाता है और वो आम आदमी की सेवा करने निकल पड़ता है। उसका फॉर्मूला है पहले लोगों को मदद करो और फिर लोगों को दूसरों की मदद करने के लिए तैयार करो। इसी थीम के आस-पास कहानी घूमती है जिसमें सलमान की टक्कर गृहमंत्री डैनी से होती है। शुरुआत में कहानी पकड़ नहीं बना पाती लगता है कि सीन्स को सिर्फ एक दूसरे सो जोड़ दिया गया है, जबकि आख़िर के आधे घंटे में फ़िल्म आपको सीट से हिलने नहीं देती।

पूरी फ़िल्म सलमान ख़ान के किरदार के इर्द गिर्द घूमती है और बाकियों के लिए काफ़ी कुछ करने के लिए नहीं बचता, जेनेलिया डिसूजा किस तरह से मर जाती हैं पता ही नहीं चलता, जबकि तब्बू के किरदार को और दमदार बनाया जा सकता था। डैजी सिंह अभिनय के मामले में ठीक हैं लेकिन एक हीरोइन का फुल पैकेज इनमें नहीं मिलता, ग्लैमर की कमी डैजी के अभिनय को भी दबा जाता है।

काफ़ी वक़्त के पर्दे पर लौटे डैनी दमदार रहे हैं और एक भ्रष्ट पुलिसवाले के रोल में आदित्य पंचोली ने अपनी छाप छोड़ी है। फ़िल्म के क्लाइमेक्स में सुनील शेट्टी की एंट्री कमाल की रही है और रोड छाप गुंडे के तौर पर संतोष शुक्ला ने बॉलीवुड में अपनी बड़ी शुरुआत की है।

सोहेल ख़ान बतौर डायरेक्टर बिखरे हुए नज़र आते हैं, जो कहानी को सीन्स में समेटने में ही व्यस्त नज़र आते हैं, जबकि वो चाहते तो कुछ किरदारों की छटनी कर के फ़िल्म को थोड़ा और तेज़ बना सकते थे। सोहेल जहां लव और इमोशनल सीन्स को फ़िल्माने में कमज़ोर नज़र आते हैं तो वहीं एक्शन सीन्स में उनकी पकड़ कमाल की है।

संगीत के मामले में फ़िल्म के गाने पहले से ही लोगों की ज़बान पर चढ़े हुए हैं। साजिद वाजिद, देवी श्री प्रसाद और अमल मलिक का म्यूज़िक बेहद आसानी से दिमाग़ पर चढ़ जाता है लेकिन ये लॉन्ग लास्टिंग नहीं है। ये फ़िल्म तक ही रहता है और जब आप हॉल से बाहर निकलते हैं, तो आपके हाव-भाव में सलमान ही सलमान छाये रहते हैं।

इतना तो तय है कि अब सलमान एक रुटीन रोल में फिट हो चुके हैं, और अगर फ़िल्म में करने को भी कुछ न हो, फ़िल्म न कहानी में फिट बैठती हो, न निर्देशन में फिर भी अगर सलमान वॉन्टेड, दबंग, रेडी और टाइगर जैसी रुटीन भूमिका निभाते हैं तो दर्शक इसे पसंद करते हैं।

फ़ैन्स के लिए ये फ़िल्म दमदार है और जो फ़ैन्स नहीं हैं उनके लिए इसमे कुछ ख़ास नहीं है।

2 Stars, One Time Watch, Action-Drama, Week Story and Screenplay, Week Direction
Don2 - Action Thriller Stylish - Must Watch

हाथों में एक गरमागरम चाय और मसालेदार पॉपकॉर्न हो और सामने पर्दे पर डॉन हो, तो समझ लिजिए चाय और पॉपकॉर्न के पैसे बर्बाद हो गए। लेकिन फ़िल्म के टिकट पर खर्च किए हर एक पैसे का हिसाब मिल जाता है। फ़रहान अख़्तर को ये पता है कि 70 एमएम पर जब तक ख़ान दिखेगा तब तक फ़िल्म चलती हुई लगेगी और अगर ख़ान लापता तो फ़िल्म भी लापता। शायद यही वजह है कि Don-2 में सिर्फ Don ही दिखता है और किसी अभिनेता के लिए कहानी में उतनी जगह ही नहीं दी गई। बोमनी इरानी मलेशिया की जेल में थोड़ी देर के लिए दिखते हैं फिर उन्हे फ़िल्म के सेकंड हाफ़ में ही थोड़ा वक़्त दिया जाता है। पहलेवाले डॉन में वरधान की जो क़ीमत थी वो डॉन 2 में मरती हुई दिखती है। डॉन की जंगली बिल्ली रोमा (प्रियंका चोपड़ा) को भी स्क्रीन पर रहने का मौक़ा तो कम मिलता ही है उसके लिए सिर्फ दो सीन ही अहम हैं एक बर्लिन की सड़कों पर कार से डॉन का पीछा करती इंटरपोल ऑफ़िसर नहीं तो फ़िल्म के क्लाइमेक्स में अच्छी फ़ाइट सीक्वेंस देनेवाली जंगली बिल्ली और हां हम गोलियों और बमों के बीच में डॉन और रोमा के प्यार को कैसे भूल सकते हैं। इसके अलावा नई एंट्री हुई हैकर समीर यानी कुनाल कपूर की। फ़िल्म के सेकंड हाफ में आए कुनाल के लिए भी डॉन जगह नहीं छोड़ता। लारा दत्ता और ओमपुरी सिर्फ चंद अल्फाज़ देने के लिए फिलर के तौर पर डॉन 2 का साथ देते हैं।
कहानी पुराने जासूसी नॉवेल सी है लेकिन नयापन लिए हुए और कहीं भी न ठहरनेवाली है। डॉन 2 की जान उसकी सिनेमैटोग्राफ़ी है। चाहे थाईलैंड के जंगल हों या मलेशिया की जेल, या फिर बर्लिन की सड़कें या हाई सिक्योरिटी से लैस बैंक, जैसन वेस्ट ने बतौर सिनेमैटोग्राफ़र उम्दा काम किया है। इसके बाद डॉनिज़्म का कमाल ही है जो फ़िल्म को इतनी शानदार ओपनिंग मिली है बावजूद इसके कि टॉम क्रूज़ की मिशन इम्पॉसिबल अभी भी सिनेमाघरों में है। भारी भरकम डायलॉग्स से अटी पड़ी डॉन 2 कहीं कहीं ओवरडोज़ भी लगती है लेकिन किंग ख़ान की इसी स्टाइल पर तो दुनिया मरती है। पहले हाफ़ में स्लो स्टार्ट के बाद फ़िल्म सेकंड हाफ़ में कमाल की स्पीड पकड़ती है हालांकि कुछ दृश्य ऐसे हैं जो जबरन फ़िल्म में ठूसे गए हैं जैसे समीर (कुनाल कपूर) की प्रेगनेंट गर्लफ्रेंड को दिखाना या ख़ान का ऋतिक के भेष में आकर एक पार्टी में प्रियंका के साथ डांस करना।
अब रही बात फ़िल्म के गीत-संगीत की तो शंकर एहसान लॉय के पास डॉन-2 में करने के लिए कुछ नहीं था क्योंकि इस फ़िल्म में गानों की कोई जगह नहीं थी, शायद ये बात डायरेक्टर फ़रहान को अच्छे से पता थी। लिहाज़ा उन्होने सिर्फ और सिर्फ ध्यान दिया डॉन पर जिसे अब सिर्फ 11 मुल्क़ों की पुलिस नहीं ढूंढ रही बल्कि पूरी दुनिया की पुलिस उसके पीछे पड़ी है। स्टाइलिश ख़ान की ये एक्शन थ्रिलर मूवी आनेवाले दो-तीन हफ़्तों तक बॉक्स ऑफ़िस पर राज करनेवाली है। प्रोड्यूसर फरहान ख़ान, रितेश सिधवानी, शाहरुख ख़ान और गौरी ख़ान ने सोच समझकर फ़िल्म के रिलीज़ की तारीख़ तय की है। 23 दिसम्बर को रिलीज़ हुई डॉन-2 ने छुट्टियों के मौसम में बॉक्स ऑफ़िस पर दस्तक दी है और इसके पास 15 जनवरी तक पूरे देश में कलेक्शन करने का अच्छा मौक़ा है।

4 Stars, Must Watch, Action-Thriller, Nice Crafted Story and Cinematography, Well Directed
Dialogues of Don 2



 डॉन के सामने आदमी के पास सिर्फ दो रास्ते होते हैं
मान जाये या मर जाये, जैसी उसकी मर्ज़ी
Don Ke Saamne Aadmi Ke Paas Sirf Do Raaste Hote Hai
Maan Jaaye Ya Mar Jaye, Jaisi Uski Marzi

ताक़त एक नशा है, और
मैं उस नशा बनाने की फैक्ट्री का इकलौता मालिक हूं
Taquat Ek Nasha Hai Aur
Mai Uss Nasha Banaane Kee Factory Ka Eklauta Malik Hu

डॉन के दुश्मन को हमेशा ये बात याद रखनी चाहिए कि
डॉन कभी कुछ नहीं भूलता
Don Ke Dushman Ko Hamesha Ye baat Yaad Rakhani Shahiye Ki
Don Kabhee Kuchh Nahi Bhulata


मुझे लोगों का ख़ून करने का कोई शौक़ नहीं
वही मुझे मजबूर कर देते हैं
Mujhe Logo Ka Khoon Karane ka Koi Shauk Nahi
Vahi Mujhe Majboor Kar Dete hain

किसने कहा कि चमत्कार नहीं होते
ज़रा मुझे क़रीब से देखो
Kisane Kaha Ki Chamatkaar Nahin Hotey
Zara Mujhe Qarib se Dekho

डॉन आदमी का नाम भूल सकता है, लेकिन
ये नहीं भूलेगा कि उसे दफ़नाया कहां था
Don Aadmi Ka Naam Bhool Sakata hai, Lekin
Ye Nahi Bhoolega Ki Usse Dafnaaya Kahaan Tha

मुझे अंधेरा पसंद है
तुम्हारे आनेवाले कल की याद दिलाता है
Mujhe Andhera Pasand Hai
Tumhare Aanewaale Kal Ki Yaad Dilaata Hai

डॉन के दुश्मन
डॉन के हाथों मरने के लिए ही पैदा होते हैं
Don Ke Dushman
Don Ke Haton Marane ke Liye Hee Paida Hotey Hain

डॉन अपने दोस्तों का हाल पूछे या न पूछे
अपने दुश्मनों की ख़बर हमेशा रखता है
Don Apane Doston Ka Haal Puchhe na Puchhe
Apane Dushmano Ki Khabar Hamesha Rakhta hai

अभी बाकी मेरी कहानी है
सारी दुनिया को जो सुनानी है
Abhee Baaki Meri Kahani Hai
Saari Duniya Ko Jo Sunani Hai


आ रहा हूं पलट के मैं
मैं हू डॉन
Aa Raha hu Palat Ke Mai
Main Hu Don

हमारे धंधे में जब दूसरो को तुम्हारी ज़िंदगी से ज़्यादा तुम्हारी मौत से फ़ायदा हो
तो ये समझ लेना चाहिए कि इट्स टाइम टू मूव ऑन
Hamaare Dhandhe me Jab Dusaro Ko Tumhari Zindagi Se Zyada Tumhari Maut Se Fayada Ho
To Ye Samajh Lena Chahiye Ki Its Time to Move on

सर, सर बहुत शरीफ लगता है, कॉल मी डॉन
Sir, Sir Bahut Sharif Lagata Hai, Call Me Don

मैंने सोचा कि जाते-जाते कुछ अच्छा काम करता जाऊं
मगर तुम लोगों ने मुझे बदलने का मौक़ा नहीं दिया, वेरी सैड
Maine Socha Ki Jaate-Jaate Kuchh Achcha Kaam Karta Jau
Magar Tum Logon Ne Mujhe Badalane Ka Mauqa Nahin Diya, Very Sad

कुत्ता अगर दुम सीधी भी कर ले
वो कुत्ता ही रहेगा
Kutta Agar Dum Sidhi Bhee Kar Le
Vo Kutta Hee Rahega

तख़्त की परवाह बादशाह से ज़्यादा उसके वज़ीर को होती है
Takhta Ki Parwaah Badshaah se Zyada Usake Vazeer Ko Hoti Hai

Mission Impossible: Ghost Protocol - Power Packed - Must Watch

देसी फ़िल्मों में रजनी कांत और परदेसी फ़िल्मों में टॉम क्रूज़, विज्ञान का कोई नियम इनके स्टंट्स में लागू नहीं होता। Mission Impossible – Ghost Protocol कुछ ऐसी ही है। क्रूज़ के लिए Mission Impossible का ये सबसे ज़्यादा Possible Mission है। अब तक की श्रृंखला में सबसे बेहतरीन पेशकश और ऐसा शायद क्रूज़ की वजह से नहीं, बल्कि अपनी पहली जीवंत एक्शन फ़िल्म निर्देशित करनेवाले ब्रेड बर्ड का कमाल है। जो अब तक एनिमेटेड फ़िल्मों में कभी न देखे जानेवाले एक्शन सीन दिखाते आए हैं। बर्ड की बनाई फ़िल्मों Academy Award विजेता The Incredibles और Ratatouille के अलावा The Iron Giant में अगर हीरो नाश्ते में ख़तरों का स्वाद चखता था, तो Mission Impossible – Ghost Protocol में क्रूज़ ख़तरों को ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर यानी 24X7 चखते रहते हैं।
क्रूज़, मिशन इम्पॉसिबल की सीरीज़ में हर एक को दूसरे से अलग रखने के लिए निर्देशकों को बदलते रहे हैं। ब्रायन डी पालमा ने पहली MI बनाई उसके बाद MI-2 जॉन वू और MI-3 जे जे अब्राम्स के कंधों पर रखी गई, लेकिन सबसे अलग इस बार ऐसे निर्देशक पर भरोसा किया गया जिसे Live Action फ़िल्मों का ज़रा भी तज़ुर्बा नहीं था। लेकिन ब्रेड बर्ड के काम ने सबकी बोलती बंद कर दी। कमाल के एक्शन सीक्वेंस, जो मिशन इम्पॉसिबल की पहचान हैं और जिसे बखूबी निभाया है 49 साल के क्रूज़ ने।
क्रूज़ की बाकी फ़िल्मों की तरह इसकी शुरूआत भी ऐसी घटना से होती है जिसके बारे में पूरी फ़िल्म में पता नहीं चलता। क्रूज़ मॉस्को की जेल तोड़कर भागते हैं, लेकिन कहानी में ये नहीं बता पाते कि वे वहां बंद क्यों थे। ख़ैर Mission Impossible हमेशा ही National Interest का मिशन रहा है लिहाज़ा इसवाले में भी क्रूज़ और उनकी टीम रूस और अमेरिकी सरकार के बीच फंस जाती है। क्रूज़ पर रूस के न्यूक्लियर कोड चुराने का आरोप है और अमेरिकी सरकार न सिर्फ उनका साथ छोड़ देती है। बल्कि वो और उनकी टीम भगोड़ा घोषित हो जाते हैं। अमेरिकी सरकार ऐसी स्थिति से निपटने के लिए सबसे उच्च स्तर Ghost Protocol को लागू करती है और यहीं से शुरू होता MI-4
बर्ड और स्क्रीनराइटर्स एर्डे नेमेक और जॉस एपलबॉम ने कहानी को बेहद करीने से पर्दे पर पेश किया है जिसमें इथन (टॉम क्रूज़) को हमेशा भागते रहना होता है। पुराने इथन की तरह ये इथन भी भागता है, ख़तरों से खेलता है, धमाकों के बीच से निकलता है, दुनिया के हर हिस्से में नियम-क़ानून तोड़ता है। इथन ऐसा करता है तो फ़िल्म में रफ़्तार दिखती है लेकिन इथन रुकता है तो फ़िल्म भी रुक जाती है।
फ़िल्म में दो सीन सबसे अहम हैं, एक जिसमें टॉम दुबई में दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज़ खलीफ़ा पर चढ़ाई करते हैं और दूसरा सीन भारतीय लिहाज़ से अहम है जब अनिल कपूर एक प्ले ब्वॉय बिज़नेस टायकून के तौर पर एंट्री मारते हैं। छोटे लेकिन दमदार रोल से अनिल हॉलीवुड में अपनी जगह पक्की करते जा रहे हैं। शायद ये अनिल का होना ही है जो भारत में इस फ़िल्म को अच्छी ओपनिंग मिली है। 
बुर्ज खलीफ़ा के सीन को आईमैक्स के 65एमएम कैमरे से शूट किया गया है। 132 मिनट की फ़िल्म में महज़ 27 मिनट ही IMAX फुटेज है लेकिन ये फ़िल्म को अगले दर्जे पर ले जाती है और इसीलिए पैरामाउंट पिक्चर्स ने फ़िल्म को IMAX Theaters में रिलीज़ करने का फ़ैसला लिया।
इथन (क्रूज़) की टीम मेंबर्स भी उसी की तरह कमाल करनेवाले हैं। जेन कार्टर (पॉला पैटन) एक एजेंट के तौर पर बेहद सख़्त भी हैं और कुछ जगहों पर ग़ज़ब की ख़ूबसूरती बिखेरती मॉडल जैसी भी है और बेंजी डन (साइमन पेग) तो हरफनमौला है हीं, जनता को हंसाने के साथ-साथ इथन को मज़बूती से सपोर्ट करने तक।


कुल मिलाकर Mission Impossible -  Ghost Protocol को मिस नहीं किया जा सकता। बहाना कुछ भी हो सकता MI Series, या Tom Cruise, या Action Scenes और Gadgets या Anil Kapoor, लेकिन देखना है तो असली मज़ा सिनेमा थियेटर में ही है और अगर IMAX में देखने को मिले तो कभी न भूलनेवाला अनुभव होगा।


3.5 Stars, Must Watch, Power Packed Action, Tight Story and Screenplay, Well Directed
Ra.One Review - Family Superhero - Decent Watch



अगर किसी ने रजनी कांत की रोबोट देखी है... तो उसे रा.वन नाउम्मीद करनेवाली है... जो बॉलीवुड की मसाला फ़िल्में पसंद करता है... उसके लिए भी रा.वन उम्मीदों पर खरी उतरनेवाली नहीं है... लेकिन जो बिना किसी शिकवे और शिकायत के साइंस फिक्शन फ़िल्में पसंद करते हैं उनके लिए रा.वन ठीक है...

फ़िल्म देखते वक़्त आपके ज़हन में किसी सीन को भी दूसरी फ़िल्म से तुलना करने का मौक़ा नहीं मिलता... निर्देशक अनुभव सिन्हा ने अच्छा अनुभव इस्तेमाल किया है... जब तक आप एक सुपर हीरो की छवि को शाहरूख में देखते हैं... तब तक सीन बदल जाता है और दूसरे सुपर हीरो से जी.वन की छवि मेल खाने लगती है... टर्मिनेटर-2 में टी-1000 की तरह रा.वन कोई भी रूप धारण कर लेता है... आयरन मैन की तरह रा.वन और जी.वन के चमकते हुए मशीनी दिल हैं... तो रोबोट की तरह मुंबई की लोकल ट्रेन पर भागते सुपरहीरो शाहरूख हैं... ऐसे ही कई सीन्स हैं... जो हैंकॉक, क्रिष, मैक्ट्रिक्स जैसी फ़िल्मों की पल भर के लिए याद दिलाते हैं

कमज़ोर कहानी... कमज़ोर स्क्रीन प्ले... लेकिन शानदार और बॉलीवुड में कभी न देखे गए स्पेशल इफेक्ट्स रा.वन को स्पेशल बना देते हैं... लंदन की सड़कों पर फ़िल्माया गया चेज़िंग सीन सबसे अट्रैक्टिव सीन है.... और एयरपोर्ट पर मेटल डिटेक्टर से बचने की कोशिश करते शाहरूख का सीन सबसे ज़्यादा हंसानेवाला है... मुंबई एयरपोर्ट पर जी.वन का लोकल गुंडों से लड़ना सबसे बढ़ियां फाइट सीक्वेंस है... बाकी फ़िल्म में सोनिया यानी करीना कपूर के सेंसर किए जानेवाले डायलॉग और सीन्स हैं... कहानी को थोड़ा और मज़बूत किया जा सकता था... अगर शाहरूख को एक पारिवारिक सुपरहीरो की जगह... दुनिया बचानेवाला सुपरहीरो बनाने की कोशिश होती
अनुभव कहानी की कड़ियों को जोड़ पाने भी नाकामयाब रहे... हर सीन अचानक से आता... अचानक से चला जाता... दर्शक समझते उससे पहले सुपरकथा का अगला अध्याय प्रारंभ हो जाता है... फ़िल्म के क्लाइमेक्स तक दर्शक कुछ नए की उम्मीद में सिल्वर स्क्रीन से आंखें गड़ाए रखते हैं... लेकिन ये क्लाइमेक्स बच्चों के कम्प्यूटर गेम की तरह ख़त्म हो जाता है...

शाहरूख ने इस फ़िल्म के लिए जान लगा दी है... और बिना किसी शक के कहा जा सकता है कि एक सुपरहीरो के किरदार को उन्होने बखूबी निभाया है... ओम शांति ओम के दूसरे हाफ में जिस तरह उनका क़िरदार सामान्य आदमी से एक सिक्स पैकवाले एक्टर में बदलता है उसी तरह रा.वन में भी एक कमज़ोर से दिखनेवाले साइंटिस्ट शेखर का बदलाव होता है सुपरहीरो जी.वन में...  शाहरूख के साथ... करीना और अरमान वर्मा का अभिनय भी काबिल-ए-तारीफ़ है... बेहद कम वक़्त के लिए आए अर्जुन रामपाल ने भी असर छोड़ा है...

संगीत के मामले में पहले से ही विशाल-शेखर की धुनों ने लोगों को दीवाना बना रखा है... लेकिन कहानी के साथ गानों का कोई मेल नहीं दिखता है... यहां भी कड़ियां जुड़ती नहीं हैं...

कुल मिलाकर स्पेशल इफेक्ट्स और शाहरूख के नाम पर फ़िल्म को एक बार देखा जा सकता है...

3 Stars, Decent Watch, Full Entertainment, Diwali Blast
Tees Maar Khan Review - Illogical - Decent Watch

जिस फिल्म का स्वागत लोग सिर्फ उसके सिगनेचर म्यूज़िक को सुनकर सीटियों से करें... (थ्रीज़ कम्पनी का बैनर, और उस पर सिगनेचर म्यूज़िक) तो आसानी से समझा जा सकता है कि एडवांस बुकिंग में ही पहले दिन के सारे शो बुक कैसे हो गए... जी हां फ़िल्म का प्रमोशन कैसे किसी फ़िल्म की बम्पर शुरुआत कराता है... वो इस फ़िल्म ने साबित कर दिया...


विस्फोटक और बड़ी ही मज़ेदार शुरुआत... अक्षय (तबरेज़ आलम ख़ान उर्फ तीस मार खां) की एंट्री से लेकर देखते ही देखते कैटरिना कैफ़ (अन्या) और अक्षय खन्ना (आतिश कपूर) की एंट्री... कैट के आइटेम डांस “शीला की जवानी” का हूटिंग और सीटियों से स्वागत होता है... फिर एक गाने में सलमान ख़ान का आना... ये सब कुछ मिलकर शुरुआत में दर्शकों को बांधे रखता है... आधी फ़िल्म तक तो वक़्त का पता ही नहीं चलता...

लेकिन अगली आधी फ़िल्म थोड़ी स्लो हो जाती है... लेकिन मज़े का दौर ख़त्म नहीं होता... फ़िल्म कहीं भी बोर नहीं करती... अक्षय कुमार स्क्रीन पर छाये रहते हैं और कैटरीना कैफ़ बीच-बीच में छौंक लगाती रहती हैं... फ़िल्म ख़त्म होती है तो ऑस्कर अवार्ड की सेरेमनी के बहाने पूरी फ़िल्म के क्रू को स्क्रीन पर आने का मौका मिलता है... कैमरा असिस्टेंट से लेकर स्पॉट ब्वॉय तक... फराह ख़ान का ये प्रयोग अच्छा लगा और ये हॉल से बाहर जाते दर्शकों को एक मिनट के लिए रोक देता है... हैप्पी एंडिंग गाना भी अच्छा लगता है...

इतनी सारी अच्छाई का बखान करने के बाद अब थोड़ी बुराई भी हो जाए... फिल्म की कहानी में ज़रा भी दम नहीं... ब्लफ मास्टर... ओए बंटी बंटी ओए... बंटी बबली... धूम... के बाद एक चोर पर बनी इस फ़िल्म में न तो चोर के पास कोई ढंग का रोचक प्लान है... न ही कोई अलग अदा... अक्षय कुमार का रोल उनके पुराने रोल जैसा ही लगता है... जो वे कॉमेडी फ़िल्मों में करते आए हैं... नई चीज़ थी जोहरी ब्रदर्स (रघु और राजीव) जो आपस में जुड़े हुए हैं और विलेन का किरदार निभाते हैं... इनका अच्छा प्रयोग हो सकता था... लेकिन नहीं हुआ...

फ़िल्म में जितने पंचिंग डॉलॉग्स हैं उन्हे प्रोमो में इतना इस्तेमाल किया जा चुका है कि उन पर थियेटर में हंसी नहीं आती... और इन सारे डॉयलॉग्स को फिल्म के पहले हाफ में ही झोंक दिया गया है... दूसरे हाफ के लिए इस तरह का कोई मसाला ही नहीं बचता... डॉयलॉग्स लिखने में कुंदर ब्रदर्स की ये कंजूसी फ़िल्म के स्पीडी स्टार्ट पर ब्रेक लगा सकती है...

संगीत के मामले में शीला की जवानी के बाद किसी गाने में वो दम नहीं दिखता जो दर्शकों को सिनेमा हॉल तक खींच कर लाए... शीला की जवानी में फराह की कोरियोग्राफी का भी कमाल देखने को मिलता है लेकिन सलमान के साथ अक्षय का गाना... बेहद धीमा है और डांस में कोई नया पन नहीं है...

1966 में आई आफ़्टर द फॉक्स फ़िल्म की पूरी कहानी यही है... एक क्रिमिनल जो गांव वालों के साथ फ़िल्म बनाता है... न्यू यॉर्क टाइम्स ने उसे क्लटर ऑफ नॉनसेंस करार दिया था... फिल्म सुपर फ्लॉप रही... ऐसे में फराह और कुंदर ब्रदर्स ने एक बड़ा रिस्क लिया है... फ्लॉप कहानी को दमदार कलाकारों से भरकर दुबारा पर्दे पर उतारना... बहुत हिम्मत का काम है... फराह ने ये जोखिम लिया है... और सितारों के गेस्ट अपियरेंस से पर्दे को भर दिया है... लेकिन फराह ने सिर्फ यही जोखिम नहीं लिया है इससे पहले फराह ने दो फिल्में बनाई हैं “मैं हूं ना” और “ओम शांति ओम”। दोनों फिल्मों में शाहरूख ख़ान थे और फिल्में हिट थीं, लेकिन इस बार फराह ने डबल अक्षय का जोखिम लिया है... अदाकारी में तो दोनों ने निराश नहीं किया... लेकिन असल मसला है फ़िल्म जाती कहां तक है...

फराह की पुरानी फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी कलाकारों के ऊपर मसखरी है... जैसे ओम शांति ओम में दिलीप कुमार पर था... तीस मार खां में आमिर ख़ान, मनोज बाजपेयी, डैन डेनज़ोंग्पा के नाम का इस्तेमाल किया गया है... और ओम शांति ओम की तरह इस फ़िल्म में भी एक फ़िल्म स्टार के लिए कपूर टाइटल का इस्तेमाल किया गया है...

कुल मिलाकर अगर आप ये फ़िल्म देखने जा रहे हैं तो दिमाग़ घर पर रख के आइए... बिना दिमाग़ लगाए, बिना कोई लॉजिक तलाशे फ़िल्म देखिए... मज़ा आएगा...

3 Stars, Decent Watch, Full Entertainment, Illogical, Paisa Vasool
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